आज सब्जी वाले के सामने ही माँ को उसके लाडले ने डाँट दिया । वो बेचारी भी सहम के वापस घर को आ गई, पर मन में लगी चोट दिखती नही । वो चुपचाप अन्दर गई और
अखबारों को तह लगा कर रखते हुए सोचती जाती ....'वो भी एक वक्त था, जब पैसे देती थी, सब्जी के लिये ....तो यही बेटा, रास्ते में वीडियो गेम की शॉप पर बैठ कर, सब्जी के हिसाब में गड़बड़ी कर देता था । सोचता था .....माँ
को समझ नही है या खबर नही, क्या भाव बाजार के हैं ? वही मुझे हिसाब सीखा रहा आज ....पाँच रुपये की मिर्च-धनिया
ले ली, तो इतना सुना दिया ! हाँ .... शायद मुझे ही अक्ल
नहीं पैसे को पकड़ के रखने की .....तभी तो पाँच रुपये के लिये सुनना पड गया । हाँ
... शायद..!'
अनुराग त्रिवेदी - "एहसास"
( प्रकाशित : जनविद्रोह )
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touching
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