Tuesday, 1 October 2013

हाँ ... शायद..!



आज सब्जी वाले के सामने ही माँ को उसके लाडले ने डाँट दिया । वो बेचारी भी सहम के वापस घर को आ गई, पर मन में लगी चोट दिखती नही । वो चुपचाप अन्दर गई और अखबारों को तह लगा कर रखते हुए सोचती जाती ....'वो भी एक वक्त था, जब पैसे देती थी, सब्जी के लिये ....तो यही बेटा, रास्ते में वीडियो गेम की शॉप पर बैठ कर, सब्जी के हिसाब में गड़बड़ी कर देता था । सोचता था .....माँ को समझ नही है या खबर नही, क्या भाव बाजार के हैं ? वही मुझे हिसाब सीखा रहा आज ....पाँच रुपये की मिर्च-धनिया ले ली, तो इतना सुना दिया ! हाँ .... शायद मुझे ही अक्ल नहीं पैसे को पकड़ के रखने की .....तभी तो पाँच रुपये के लिये सुनना पड गया । हाँ ... शायद..!'
  


                         अनुराग त्रिवेदी - "एहसास" 

( प्रकाशित  : जनविद्रोह  ) 

उसका नाम क्या था ?


 
     
अपने काम से ही पहचानी जाती थी वो । कभी किसी ने उसका नाम ही नही पूछा । दूर किसी मुहल्ले से वो आती कालोनी में । चाहे आग सी तपिश हो या मूसलाधार बारिश या फिर कंपकपाती सर्दी । अपने बंधे घरों में वो समय पर ही हाज़िर हो जाती । उम्र  तकरीबन सत्तावन साल के आस-पास, नाक में बड़ी सी नथ, हाथ में ढेर सारी काँच की चूड़ियाँ.... जो उसके मालिश करते समय  बजती थी । ठेठ बुन्देलखंडी भाषा बोलती थी वो । डील-डौल से साधारण और मध्यम काठी ..... चलती तो लगता मानो उसके पीछे कोई कुत्ता पड़ा हो । कभी कहीं आते-जाते अपने बंधे परिवारों के किसी सदस्य को दूर से देखती तो मुस्कुरा देती .....एक चाह मन में लिए कि वे भी उसे पहचान लें और मुस्कुरा दें .....और फिर जब उनसे उनके घर में मिलती तो आत्मीयता जता कर बताती :- परों हमने आप खों देखो हतो..!पर सुन कर भी किसी पर खास प्रभाव नहीं पड़ता था । इतना भी नहीं कि उसकी बात पर पलट कर कोई अच्छा..! ही कह दे ।

उसे कभी किसी से कोई शिकायत ना होती ....उसे तो बस अपना काम प्रिय था । उसे लगता कि वो नित्य ही पुण्य कर्मों का प्रताप पा रही है । उसके बंधे घरों में दो तरह के घर होते थे ....एक तो वो, जिधर बुजूर्ग थे और दूसरे वो, जिधर किसी नवजीवन का आगमन होता था । वो कहती :- हम तो साछात भगवान की सेवा कर रये हैं..!सच ही तो था ईश्वर की अनुपम नवीन कृति के साथ-साथ उसकी जन्मदायिनी की सेवा करती थी और साथ ही उस वर्ग की सेवा करने का अवसर मिल रहा था उसे, जिसके लिये समय नही किसी के पास । कहती थी :- हाथ पैर चलत रहें .....आप औरन की सेवा करत करत बस..  !अनपढ होते हुये भी दार्शनिकता भरी बातें कह जाती थी । कभी एक दिन भी उसका ना आना हो तो उसके बंधे घर वाले बैचेन हो उठते । पूछते सवाल :- क्यूँ नही आई.. !और जब, बहुत ललक से वो अपनी आप-बीती कहना चाहती ..... शुरु ही करती कि उलाहने शुरु हो जाते :- अब अगर एक दिन और ना आती तो तुम्हारी छुट्टी करके किसी और को बुला लेते।वो अपना दर्द कह भी ना पाती.. बस इतना ज़रूर कहती :- ना मालिक ! ऐसो ना करो.. सेवा खों अवसर मिलत है भाग्य वालों खों..!" पर मन मसोज के फिर कसे हाथ लग जाती अपने काम में ।

अचानक एक दिन आना बंद हो गया उसका ....कारण किसी को भी नहीं पता । जब हफ्ते से महीना गुजरा ....सभी ने खबर लेनी चाही.... दूसरी खबासन बाईयाँ बुलाई गईं जो पैसा मर्जी-मुताबिक लेती.... हाथ भी ढीले चलते उनके और हर बात पे अड़ जाती..।  सब चाह रहे थे कि खबर लें वो किधर गई..? नई आने वाली कोई मीना थी तो कोई रजनी.. ! सब नाम से पहचानी जाती थी पर वो तो बस खबासन बाई थी..किसी को नाम भी ना पता था उसका । सब पूछते उन नई बाईयों से तो वो टका सा जवाब देती :- हमें का पता..कौन खबासन बाई ? हम अपने काम से मतलब रखते हैं..बस !” 

अब सबको उसके जाते ही एहसास हुआ.. और मन ही मन हजार बार सभी ने उसकी खैरियत पूछी ! वो है किधर ...कैसी है ? अनाप-शनाप पैसा लगने पर सब आतुर हुये.. और बोले :- वो बुढिया किधर है ?” कालोनी में ये विषय चर्चा में बना रहा पर आज भी किसी को नही पता.. वो जिन्दा भी है ..या .....और क्या था उसका नाम ?

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     प्रकाशित : पत्रिका , जबलपुर                      

                                                           अनुराग त्रिवेदी-एहसास